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Last Update : 7:41:PM 08-02-2024





इतिहासकारों ने“कोल” शब्द की उत्पति के बारेमेंवि भि न्न मत दि या हैं|"कोल" जनजाति भारत वर्ष के सबसे प्राचीन जनजाति है | ये प्रोटो-अस्ट्रोलाइट समूह के अन्तर्गत आती हैं।भाषावैज्ञानि कों नेसमस्त आदि म भाषा, संरचना को लेकर एक रेस या प्रवाह की धारणा प्रस्तुत कि ए हैंजिन्हें प्रोटो - अस्ट्रोलाइट समूह के नाम सेजाना जाता है। इसेकोलारीयन प्रजाति भी कहा जाता है। भारतवर्ष के विद्वानों में इस अवधारणा को लेकर वि वि ध मत है।एक शोध आलेख के अनुसार संभवतः छोटा

नागपरु के खडि या द्वारा "मंडु ा" लोगों को "कोरारा" नाम दि या गयाऔर कालांतर मेंयह “कोल” शब्द में परिवर्ति त हो गया ।1975 मेंक्रम्स. डब्लू के अनसु ार कोल शब्द मंडु ारी भाषा के "हो" या "होरो" शब्द

सेआया है जि सका अर्थ होता है"आदमी" जो आगेचलकर कोरो, कोल के रूप मेंपरि वर्ति त हो गया।

वदै ेशि क इति हासकार हेडने के अनसु ार "कोल" छोटा नागपरु के मंडु ाओं की एक साखा के रूप मेंवर्णन

कि या गया है परंतु शारीरि क गठन और सांस्कृति क रूप से वि भि न्न प्रदेश के “कोल” जनजाति में

समानता पाये जाते हैं। ये जनजाति मंडु ा,हो,संथाल,आदि जनजाति से मि लते जलु ते हैं।“कोल” शब्द की

उत्पति और उसके व्यवहार के बारे मेंप्राचीन काल के साहि त्य सेवि भि न्न शि लालेख के माध्यम सेहमें

मि लता आ रहा है | कोल समुदाय को प्राचीन जन जाति समुदाय में भारत वर्ष के वि भि न्न राज्य में

लि पि बद्ध कि या गया है|’कोल’ शब्द रामायण ,महाभारत जैसेपौराणि क ग्रंथ में "कोल कि रात" के रूप

सेमि लता तो है ही साथ ही येशब्द प्राचीन वेदों में भी देखनेको मि लता है |कोल समुदाय की सही

संख्या कहीं पर उपलब्ध नहींहै |1981 के जनगणना को आधार मानकर अगर हम चलेंतो उनकी

संख्या मध्यप्रदेश में ही 132232 है 1| “कोल” समदु ाय लगभग 5 शताब्दी पर्वू छोटा नागपरु से मध्य

भारत में आए और यह मुख्य रूप सेझारखंड, पश्चि म बंगाल, बि हार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश,

उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में पाए जाते हैं। प्रति ष्ठि त अखबार नवभारत टाइम्स के मुताबि क वर्तमान

झारखंड में करीब दो लाख कोल जाति के लोग नि वास करतेहैं। मध्य प्रदेश मेंलगभग 10 लाख कोल

नि वास करतेहैं, वही उत्तर प्रदेश में इनकी आबादी लगभग 5-7 लाख है. यह उत्तर प्रदेश मेंसबसेबड़ी

जनजाति हैं2। यहां यह मख्ु य रूप से प्रयागराज, वाराणसी, बांदा और मि र्जा परु जि लों मेंनि वास करते

हैं| मध्य प्रदेश, बि हार, झारखंड और छत्तीसगढ़,उड़ीसा में इन्हें अनुसूचि त जनजाति के रूप में

सूचीबद्ध कि या गया है।उत्तर प्रदेश मेंइन्हेंअनुसूचि त जाति के रूप मेंवर्गी कृत कि या गया है।1975 में

आर. पी. रोसलेके अनुसार "कोल" कोलेरि यन परि वार की जनजाति हैजबकि 1971 मेंअमीर हसन के

अनसु ार ये मंडु ा परि वार के अतं र्गतआते हैं।मंडु ा परि वार के अतं र्गत , भमिू ज, तमरि या, जआु गं ,परि वार

की जनजाति यां भी प्रमुख रूप से आते हैं।

कोलों की उद्भव और उत्पति और वि कास के बारेमेंबहुत सारी कथानक प्रचलि त है।इस दौरान मैं

ओडि शा,झारखंड,बंगाल,मध्यप्रदेश,असम के वि भि न्न अंचल का दौरा कि या और प्रत्येक अंचल के लोक

कथाओं को जानने की कोशि श की ।

मध्य प्रदेश के कोल आदि वासी समाज सेवा संघ कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष श्री वसंत कुमार कोल के

अनुसार "लुनार" वंश के पांचवेराजा “यजति ” नेअपनी राजधानी अपनेपांच पुत्रों के बीच मेंबांट दीये।

उनके पुत्रों के वंशज मेंसेएक दक्षिण मेंजाकर बसे। उनकी दसवी पीढ़ी मेंचार भाई हुए पंड्या,कोरल,चोल, और कोल। कोल राजाओंके संतानेकोल के रूप सेजानेजातेहैंऔर हम सभी उन्ही के वंशज हैं

|मध्यप्रदेश के कुछ अंचल और इलाहाबाद, बांदा क्षेत्र के कोल अपनेको रामायण कालीन शबरी के

वंशज मानतेहैं।इनके अनुसार शबरी चि त्रकूट के पास वास करती थी। वहींभगवान राम को जूठे बैर

खि लाई थी और इसी कारण हेतुआज भी मध्यप्रदेश के वि भि न्न क्षेत्र मेंआदि वासि यों द्वारा शबरी जन्म

दि वस फरवरी 24 को धूम-धाम से पालन कि या जाता है।दूसरेलोक कथानक के अनसु ार “कोल” समदु ाय के आराध्यदेव 'सि गं बोंगा' नेआटा से एक लड़का

और लड़की उत्पन्न करके एक गुफा में रखा ।गुफा में उन्होंनेचावल का शराब जि सेहंडि या(डि यांग)

बनानेसि खाया। उस डि यांग पीनेसेउनमेंकाम भावना जागृत हुआ और उनके 12 पुत्रों तथा पुत्रियों का

जन्म हुए और उन्हीं से दनिु या की रचना की गई। सि गं बोंगा के आदेश अनसु ार इन जोड़ों को वि भि न्न

प्रकार खाद्य पेय को चुननेको कहा गया प्रथम और दूसरेजोड़ेनेभैंस और बैल का मांस को पसंद कि ए

इन जोड़ों द्वारा उत्पन्न लोगों को कोल और भूमि ज कहा गया।अन्य जोड़ों नेशाकाहारी भोज्य पसंद

कि ए उनमेंसेब्राह्मण और क्षत्रिय पैदा हुए।जो मछली पसंद कि ए उन्हेंभुइया कहा गया।जो सुअर खाना

पसंद कि ए उन्हें संताल कहा गया,और जो दूसरों सेमांग कर खाता रहा उसको घसि या कहा गया।इस

प्रकार मानव सभ्यता की वि कास की धारा आगे बढ़ते गई।

उत्तर प्रदेश के कोलों के बारे मे इति हासकार डक 1911 में एक रि पोर्ट प्रस्तुत कि ए उसमेये

लि खते हैंमि र्जा परु के जो कोल हैंवो "वरदी" राजा के वंशज मानते हैं4।और ये कु टली क्षेत्र मेंरहते थे।

कुटि ल क्षेत्र के वि नाश के बाद येलोग मि र्जा पुर के पठार क्षेत्र मेंबस गए।इस क्षेत्र को कलान के नाम से

जाना जाता है।

“कोल” समदु ाय को साधारण रूप में"हो" भी कहा जाता है | कोल,मंडु ा,हो,और संथाल ये शब्दों के

बीच बहुत ही गहरा संपर्क है|’हो” शब्द का अर्थ मानव अर्था त मानव जो भाषा बोलतेहैंउसे“हो” कहा

जाता है| “हो" शब्द को मूलतः 'हो' की प्रकृति एवं जड़ता की वास्तवि कता के साथ दर्शा या गया है। 'हो'

आदि वासीयों की शारीरि क बनावट एवंउसके शांत, सरल, सुशील,ईमानदार, दयालु, एकांतप्रिय,

स्वतंत्रता प्रिय गुणों को सजीवता सेप्रस्तुत करता है। 'हो' आदि वासी की पहचान, अस्ति त्व, इज्जत,

सामाजि क, सांस्कृति क, धार्मि क, जल,जंगल, जमीन एवंअपनेअधि कारों की रक्षा हेतुयुद्ध को पसन्द

करनेकी प्राकृति क स्वभाव की वास्तवि कता को प्रस्तुत करता है। “हो” आदि वासी को "कोल" शब्द से


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